Bhajan

छींद को दादा अलबेला लगे मंगल को मेला

छींद को दादा अलबेला लगे मंगल को मेला के आकर्षक भजनों की लयबद्धता में खो जाएं, जहां आध्यात्मिकता की सुगंध हर सांस के साथ आपके भीतर समा जाती है। इस भजन के माध्यम से अपने हृदय के द्वार खोलें और दिव्य प्रेम के अथाह सागर में डुबकी लगाएं। छींद को दादा अलबेला लगे मंगल को मेला का हर सुर एक आध्यात्मिक अनुभव है, जो आपको जीवन की क्षणभंगुरता से परे, अनंत की ओर ले जाता है।

छींद को दादा अलबेला,
लगे मंगल को मेला।।



कोई कहे बजरंगी आला,

कोई कहे अंजनी के लाला
राम को भगत अकेला,
लगे मंगल को मेला।।



रावण पूंछ में आग लगाई,

तुमने उसकी लंका जलाई,
खेल अजब तुमने खेला,
लगे मंगल को मेला।।



सीता राम लखन मन लाई,

तुमने छाती फाड़ दिखाई,
कौन गुरु कौन चेला,
लगे मंगल को मेला।।



छींद गांव की महिमा न्यारी,

मेला भरत दशहरा पे भारी,
भक्तों की रेलम रेला,
लगे मंगल को मेला।।



बजरंग के गुण गाओ प्राणी,

‘पदम’ यूं कह गये ज्ञानी ध्यानी,
जग है झूठा झमेला,
लगे मंगल को मेला।।



छींद को दादा अलबेला,

लगे मंगल को मेला।।

Writer – Dalchand Kushwah ‘Padam’
9993786852


अंत में, जब “छींद को दादा अलबेला लगे मंगल को मेला” के अंतिम स्वर मौन में विलीन हो जाते हैं, तो इस भजन की परिवर्तनकारी शक्ति को अपने हृदय में समाहित होने दें, जो आपको आंतरिक शांति और अटल भक्ति के मार्ग पर ले जाती है।
छींद को दादा अलबेला लगे मंगल को मेला के भक्तिमय गीतों में अपने आप को खो दें, जो आपको जीवन की रोजमर्रा की भागदौड़ से दूर ले जाते हैं और आपको आध्यात्मिकता के एक स्वप्निल संसार में पहुँचाते हैं। हर बार जब आप “छींद को दादा अलबेला लगे मंगल को मेला” सुनते हैं, तो आप अपने भीतर एक गहरी शांति और संतोष का अनुभव करेंगे।

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