Bhajan

भगवन साँची कहो ना बिचारी है क्या लिरिक्स

भगवन साँची कहो ना बिचारी है क्या लिरिक्स के आकर्षक भजनों की लयबद्धता में खो जाएं, जहां आध्यात्मिकता की सुगंध हर सांस के साथ आपके भीतर समा जाती है। इस भजन के माध्यम से अपने हृदय के द्वार खोलें और दिव्य प्रेम के अथाह सागर में डुबकी लगाएं। भगवन साँची कहो ना बिचारी है क्या लिरिक्स का हर सुर एक आध्यात्मिक अनुभव है, जो आपको जीवन की क्षणभंगुरता से परे, अनंत की ओर ले जाता है।

भगवन साँची कहो ना,
बिचारी है क्या,
हाँ बिचारी है क्या,
भगवन सांची कहो ना,
बिचारी है क्या।।

(केवट प्रसंग)
देखे – पैर धो लेने दो भगवन।



करके पत्थर की ऋषि नारी,

आये मेरे पास मुरारी,
नोका बनी काठ की म्हारी,
इसकी बारी है क्या,
भगवन सांची कहो ना,
बिचारी है क्या।।



मैंने सुना है आपके,

तो चरणों में जाने बात क्या,
छुवत सिला नारी भई तो,
काठ की औकात क्या।
मेरा यही रुजगार है,
तो रुजगार बिन प्रभु जात क्या,
करिए कृपा करुणानिधे,
मुझ दीन के संग घात क्या।

मेरी बनी काठ की तरणी,
परसत चरण बने मुनि ग्रहणी,
फिर क्या इससे खोटी तरणी,
नाथ धारी है क्या,
भगवन सांची कहो ना,
बिचारी है क्या।।



चरनारबिंदो की शपथ,

अब ही मंगाई ही है नई,
दो चार दिन ही है चलाई,
मानिये मेरी कहि।
झूटी नही यह सत्य है,
कि बन में सिला नारी भई,
पाहन कठिन है काठ से,
कैसे भरोसा हा दई।

मेरी जावे नाव उड़ाई,
रोवे बच्चे और लुगाई,
मेरे पास न कोडी पाई,
नाथ धारी है क्या,
भगवन सांची कहो ना,
बिचारी है क्या।।



स्वीकार विनती हो अगर,

तो स्वीकृति प्रभु दीजिए,
पहले चरण धुलवाईये,
इतना अनुग्रह कीजिए।
जब तक ना पद पंकज पखारु,
तो नाथ ना मन लीजिये,
लाऊ नही नैया मदइया,
आप कितना ही खिजिये।

ऐसा समय फेर नहीं आनी,
सारी बात करूँ मनमानी,
मत कहना सारंग बानी,
ये अनारी है क्या,
भगवन सांची कहो ना,
बिचारी है क्या।।



केवट के सुनकर बचन,

राजिवनयन मुस्का गये,
केवट प्रभु की बात सुनकर,
सिय लखन सकुचा गये।
केवट कुटुंभी ले कुटम्ब,
और गंग तट पर आ गये,
ये दृश्य देखन देवता,
ले विमान नभ पर छा गये।

ये पद ब्रह्मादिक नही जो है,
वे पद केवट मल मल धोये,
सारे पाप जनम के धोये,
इसमें ख्वारी है क्या,
भगवन सांची कहो ना,
बिचारी है क्या।।



चरणकमल रज धोय केवट,

नाव लायो घाट है,
प्रभु को बिठा बल्ली लगाकर,
करता चला जयकार है।
बोले गगन से देवता,
तू धन्य माँझीवार है,
और प्रभु से पहले हो गया,
तू भवसागर के पार है।

उतरे सुरसरि तट हरि जाई,
मन में सकुचे श्री रघुराई,
इसको क्या देवे उतराई,
हाथ खाली है क्या,
भगवन सांची कहो ना,
बिचारी है क्या।।



जान पिय की बात हिय की,

तो मूंदड़ी सिय ने दयी,
देने लगे केवट को प्रभु,
कहकर अनुच्छित ना लयी।
गंगा का मांझी सिर्फ मैं,
भवसिंधु के मांझी दयी,
करना मुझे भवपार प्रभु जी,
यही है मेरी उतराई ।

करके प्रभु पद कमल प्रणाम,
केवट हर्ष चलत निजधाम,
जपता पथिक सिंधु जननाम,
सुधि बिसारि है क्या,
भगवन सांची कहो ना,
बिचारी है क्या।।



भगवन साँची कहो ना,

बिचारी है क्या,
हाँ बिचारी है क्या,
भगवन सांची कहो ना,
बिचारी है क्या।।

गायक – श्री अमरचन्द सोनी।
प्रेषक – मुकेश कुमार वैष्णव।
9587982200


अंत में, जब “भगवन साँची कहो ना बिचारी है क्या लिरिक्स” के अंतिम स्वर मौन में विलीन हो जाते हैं, तो इस भजन की परिवर्तनकारी शक्ति को अपने हृदय में समाहित होने दें, जो आपको आंतरिक शांति और अटल भक्ति के मार्ग पर ले जाती है।
भगवन साँची कहो ना बिचारी है क्या लिरिक्स के भक्तिमय गीतों में अपने आप को खो दें, जो आपको जीवन की रोजमर्रा की भागदौड़ से दूर ले जाते हैं और आपको आध्यात्मिकता के एक स्वप्निल संसार में पहुँचाते हैं। हर बार जब आप “भगवन साँची कहो ना बिचारी है क्या लिरिक्स” सुनते हैं, तो आप अपने भीतर एक गहरी शांति और संतोष का अनुभव करेंगे।

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