Bhajan

मेरा सतगुरु हो दातार काट दो फंदा

मेरा सतगुरु हो दातार काट दो फंदा के आकर्षक भजनों की लयबद्धता में खो जाएं, जहां आध्यात्मिकता की सुगंध हर सांस के साथ आपके भीतर समा जाती है। इस भजन के माध्यम से अपने हृदय के द्वार खोलें और दिव्य प्रेम के अथाह सागर में डुबकी लगाएं। मेरा सतगुरु हो दातार काट दो फंदा का हर सुर एक आध्यात्मिक अनुभव है, जो आपको जीवन की क्षणभंगुरता से परे, अनंत की ओर ले जाता है।

मेरा सतगुरु हो दातार,
काट दो फंदा,
मुझको सुजे नाय,
जन्म का अँधा।।



मुल कमल के माय,

गुणेशा बंदा,
रिद्धि सिद्धि ढोले भाव,
होवे आनन्दा।।



ससी बाण के बीच,

खेल कर बंदा,
खट स्वासा माय,
हरी तो जिंदा।।



पिला रंग पछाण,

चार है झंड़ा,
चारुं की पांख पछाण,
गाजरी गंगा।।



वांका दर्शन पाए,

होवे अणंदा,
गावे गोरख नाथ,
रुप सोअंगा।।



मेरा सतगुरु हो दातार,

काट दो फंदा,
मुझको सुजे नाय,
जन्म का अँधा।।

गायक – प्रेम रावल ‌जी सूराज।
प्रेषक – प्रहलाद नाथ बागजणा।

भीलवाड़ा राजस्थान।
9571438243


अंत में, जब “मेरा सतगुरु हो दातार काट दो फंदा” के अंतिम स्वर मौन में विलीन हो जाते हैं, तो इस भजन की परिवर्तनकारी शक्ति को अपने हृदय में समाहित होने दें, जो आपको आंतरिक शांति और अटल भक्ति के मार्ग पर ले जाती है।
मेरा सतगुरु हो दातार काट दो फंदा के भक्तिमय गीतों में अपने आप को खो दें, जो आपको जीवन की रोजमर्रा की भागदौड़ से दूर ले जाते हैं और आपको आध्यात्मिकता के एक स्वप्निल संसार में पहुँचाते हैं। हर बार जब आप “मेरा सतगुरु हो दातार काट दो फंदा” सुनते हैं, तो आप अपने भीतर एक गहरी शांति और संतोष का अनुभव करेंगे।

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