Bhajan

मैं तो रोज रोज थारा ही गुण गाऊ खाटू वाले जी

मैं तो रोज रोज थारा ही गुण गाऊ खाटू वाले जी के आकर्षक भजनों की लयबद्धता में खो जाएं, जहां आध्यात्मिकता की सुगंध हर सांस के साथ आपके भीतर समा जाती है। इस भजन के माध्यम से अपने हृदय के द्वार खोलें और दिव्य प्रेम के अथाह सागर में डुबकी लगाएं। मैं तो रोज रोज थारा ही गुण गाऊ खाटू वाले जी का हर सुर एक आध्यात्मिक अनुभव है, जो आपको जीवन की क्षणभंगुरता से परे, अनंत की ओर ले जाता है।

मैं तो रोज रोज थारा ही,
गुण गाऊ खाटू वाले जी।

दोहा – हारे के सहारे आप हो,
मेरे खाटू लखदातार,
सरन में थारे आ गयो,
बाबा रख दो मारी लाज।



मैं तो रोज रोज थारा ही,

गुण गाऊ खाटू वाले जी,
हेलो मारो सामलो जी,
लखदातार जी,
हेलो मारो सामलो जी।।



तीन बाण धारी श्याम,

तीर ना चलाओ,
दिल मेरा बोले श्याम,
जल्दी बुलाओ,
माने पल पल थानी याद,
गणी आवे खाटू वाले जी,
हेलो मारो सामलो जी,
लखदातार जी,
हेलो मारो सामलो जी।।



हारे के सहारो बाबा,

तू ही एक म्हारो,
दुनिया में म्हारो श्याम,
कोई ना सहारो,
ओ थारे सरणा में आयो हु,
दोई कर जोड़ खाटू वाले जी,
हेलो मारो सामलो जी,
लखदातार जी,
हेलो मारो सामलो जी।।



हर ग्यारस ने थारे,

भीड़ भारी लागे,
भगत करे जय कारे,
शीश दानी न्यारे,
बाबा खाटू री नगरी में,
नाम गूंजे लखदातार जी,
हेलो मारो सामलो जी,
लखदातार जी,
हेलो मारो सामलो जी।।



कलयुग में श्याम थांको,

शीश पुजावे,
दिन दुखी आवे द्वार,
सहारों बन जावे,
शीश दानी जग में नाम,
अमर कहावे खाटू वाले जी,
हेलो मारो सामलो जी,
लखदातार जी,
हेलो मारो सामलो जी।।



थारो भजन श्याम,

सबने सुनाऊ,
मन में उठी लगन,
द्वार मैं आउ,
‘धरम’ आपरा सरना में,
गुण गावे खाटू वाले जी,
हेलो मारो सामलो जी,
लखदातार जी,
हेलो मारो सामलो जी।।



मैं तो रोज रोज थाका ही,

गुण गाऊ खाटू वाले जी,
हेलो मारो सामलो जी,
लखदातार जी,
हेलो मारो सामलो जी।।

लेखक / गायक – धर्मेंद्र तंवर।
Mobile – 9829202569


अंत में, जब “मैं तो रोज रोज थारा ही गुण गाऊ खाटू वाले जी” के अंतिम स्वर मौन में विलीन हो जाते हैं, तो इस भजन की परिवर्तनकारी शक्ति को अपने हृदय में समाहित होने दें, जो आपको आंतरिक शांति और अटल भक्ति के मार्ग पर ले जाती है।
मैं तो रोज रोज थारा ही गुण गाऊ खाटू वाले जी के भक्तिमय गीतों में अपने आप को खो दें, जो आपको जीवन की रोजमर्रा की भागदौड़ से दूर ले जाते हैं और आपको आध्यात्मिकता के एक स्वप्निल संसार में पहुँचाते हैं। हर बार जब आप “मैं तो रोज रोज थारा ही गुण गाऊ खाटू वाले जी” सुनते हैं, तो आप अपने भीतर एक गहरी शांति और संतोष का अनुभव करेंगे।

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